हाय, अभी दिल्ली दूर है!

हाय, अभी दिल्ली दूर है!
-रडयामल्हारी

अब दिल्ली दूर कहाँ?
लो, आ गए हम!
अब इसे खास न बनने देंगे।

क्योंकि, जब खास बना आम, ओ मफलर!
हाय वो कालिख,  हाय वो तमाचे!
तेरे दीवान-ऐ-आम के मंसूबों को शिकस्त न दे पाये!

बेग़ैरत ये साबित कर गया की दिल्ली का आदमी आम है.
बेचारा, फिर ठगा गया.

“क्या करें साहब हमसे इंतज़ार न होता, हमरा सबकुछ ‘प्रीमैचोर’ है!
साल भर ऊ बंडी ने क्या कर दिखलाया?
न सौ दिन पूरे हुए, न अच्छे दिन ही आये.”

दृश्य कुछ जाना-पहचाना नहीं लगता?
जब गुलाब पूछता फिरता आज़ादी का मतलब?
आज ‘अच्छे दिनों’ का मतलब वह प्रश्न है.
और इतिहास गवाह है– भारत जवाब नहीं जानता।

‘अच्छे दिनों’ का ‘आम’ मतलब है महंगाई का निकाल और हाई-लिविंग, शायद।
अच्छे दिनों का मतलब विकास भी है.
और विकास सौ दिनों में नहीं होता रे आम आदमी!
तीन सौ पैंसठ दिनों में भी नहीं।

सिर्फ झाड़ू लगाने से भी नहीं।
विकास से मतलब है आने वाला कल.
पर ‘आम’ आदमी आज में जीता है-
वह उस कल के लिए अपना आज त्याग नहीं कर सकता.
क्या करे, बेचारा आम जो ठहरा.

मर गए वे कबके जो मर सकते थे देश के लिए.
शायद बेहतर यही होता आज़ादी न मिली होती.
क्योंकि आम आदमी ग़ुलामी ही चाहता है.
शासन के बजाय अराजकता और अखंडता की जगह टुकड़े चाहता है.

हम बिलकुल नहीं बदले,
तब भी लड़ते थे, आज भी लड़ते हैं
और बड़े गर्व से कहते हैं-
“अनेकता में एकता”!

इसिलए आज भी ग़ुलाम हैं.
‘आम’ सोच के.
हाय, अभी दिल्ली दूर है!

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